प्रकृति स्वयं कर्म परायण है। ये जीव जो प्रकृति के वश रहता है यह भी कर्म परायण है प्रकृति (इसके तीन गुण )जीव से कर्म करवा ही लेते है। भगवान् श्री कृष्ण अर्जुन को कर्म ,अकर्म और विकर्म का स्वरूप समझाते हुए कहते हैं -हे अर्जुन कर्म क्या है और अकर्म क्या है इसे लेकर बड़े बड़े ग्यानी व्यामोह में फंसे रहते हैं। कर्मों की गति बड़ी गहन है। किम कर्म किमकर्मेति कव्योअपयत्र मोहिता : | तत् ते कर्म प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यते अशुभात || कर्म के फल का स्वरूप कैसा होगा उसके हिसाब से कर्म को तीन भागों में बांटा जा रहा है : कर्म ,अकर्म ,विकर्म। कर्म करने में नीयत के अनुसार फल मिलता है मंदिर में रहने वाला पुजारी पूजा अर्चना भगवान् को नहलाना आदि कर्म करता हुआ दिख सकता है लेकिन अगर उसकी नीयत कहीं और है भोग विलास में है तो उसका कर्म अकर्म हो जाएगा। इसी प्रकार एक नेता या समाज सेवी ऊपर से समाज सेवा में संलग्न दिख सकता है लेकिन अगर उसकी नीयत वहां नहीं है सेवा में उसका मन नहीं है किसी और एषणा में गुंथा है तो उसका कर्म भी अकर्म हो ज...